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टिकट को लेकर बीजेपी और कांग्रेस दोनों दल उलझन में

खंडवा लोकसभा
उपचुनाव
प्रत्याशी चयन पर दोनों पार्टी नही बना पा रही हैं आम राय

बीजेपी में भले ही शिव की पसंद हैं हर्ष, पर जिताऊ उम्मीदवार हैं अर्चना चिटनीस


भोपाल मप्र में उपचुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद भी बीजेपी ओर कांग्रेस उम्मीदवार चयन में उलझ गए हैं, कांग्रेस में तय माने जा रहे उम्मीदवार अरुण यादव के चुनाव लड़ने इंकार के बाद हालात बिगड़ गए है, वही भाजपा में शिवराज की पसंद हर्ष चौहान हैं जो कि भाजपा संगठन को नापसंद हैं, संगठन दमोह उपचुनाव की पुनरावृत्ति नही करना चाहता हैं ,राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भाजपा संगठन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पसंद की अनदेखी नही करना चाहते हैं,जिसके चलते गेंद केंद्रीय नेतृत्व के पाले में हैं कुल मिलाकर फ़ैसला मोदी और शाह जी की जोड़ी को करना है। वही कांग्रेस के भी हालात भाजपा की तरह हैं, पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ओर दिग्विजयसिंह अरुण यादव के समर्थन में नही है जबकि अरुण यादव अपने को तय उम्मीदवार माने हुए थे। अपना खेल बिगड़ता देख अरुण यादव ने  कांग्रेस प्रत्याशी की अधिकृत घोषणा से पूर्व ही अपनी दावेदारी वापस लेकर फैसला कांग्रेस आलाकमान पर छोड़ दिया जिससे यह तो साफ है कि खंडवा लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी चयन को लेकर दोनों दलों में मशक्कत जारी हैं।




क्यो हैं शिव की पसंद हर्ष

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  खंडवा लोकसभा से क्यो हर्ष चौहान की दावेदारी पर अड़ गए हैं, जिसके चलते वंशवाद का विरोध करने वाली भाजपा अपने घर मे घिर गई हैं। हर्ष चौहान की आपराधिक छवि ओर राजनेतिक योग्यता शून्य होने के बाबजूद भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दिवंगत सासंद नंद कुमार सिंह(नंदू भैया) से अपनी मित्रता निभाने के लिए उनके पुत्र को उम्मीदवार बनाने की पुरजोर पैरवी कर रहे हैं,जिसका भाजपा कार्यकर्ता खुलेआम विरोध कर रहे हैं। बीजेपी कार्यकर्ता मुखर होकर बोल रहे हैं कि वंशवाद और अनुकम्पा नियुक्ति भाजपा की परंपरा नही रही हैं।

कैलाश विजयवर्गीय और मोघे के नाम पर भी विचार
भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के खंडवा लोकसभा से चुनाव लड़ने के कयास लगाए जा रहे है जबकि सूत्रों का कहना है कि कैलाश विजयवर्गीय खंडवा से लोकसभा चुनाव लड़ने की मना कर चुके है, उधर पूर्व सासंद कृष्णमुरारी मोघे के समर्थक तो हर्ष चौहान की दावेदारी का विरोध प्रदेश भाजपा कार्यालय पर हंगामा मचाकर कर चुके है, अब देखना है कि भाजपा केंद्रीय नेतृत्व क्या निर्णय लेता है।

संगठन की पसंद क्यो हैं अर्चना

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की पृष्ठ भूमि से आने वाली अर्चना चिटनीस मप्र में साफ सुथरी छवि की महिला नेत्री के तौर पर जानी जाती हैं, मप्र में  भाजपा सरकार में उच्च शिक्षा, स्कूली शिक्षा और महिला बाल विकास जैसे महत्वपूर्ण विभागों को निर्विवाद रूप से बखूबी संभालकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी हैं। कार्यकर्ताओं में दीदी के नाम से लोकप्रिय अर्चना चिटनीस बुरहानपुर और नेपानगर दोनों विधानसभा से चुनाव जीत चुकी हैं, महिलाओं में उनकी लोकप्रियता भी अच्छी खासी हैं। भाजपा सूत्रों की माने तो संगठन एक बेहतर छवि वाले प्रत्याशी को खंडवा लोकसभा चुनाव में उतारने की रणनीति बना रहा है जिसके चलते संगठन अर्चना चिटनीस पर दांव लगा सकता है।

बीजेपी को सता रहा हैं दमोह का डर

भाजपा संगठन को डर हैं कि यदि हर्ष चौहान को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के दबाब में उम्मीदवार घोषित कर दिया जाता हैं तो दमोह उपचुनाव जैसा परिणाम ना सामने आ जाये, दमोह में बीजेपी कार्यकर्ताओं की अनदेखी संगठन और मुख्यमंत्री दोनों को भारी पड़ी थी, कही ना कही खंडवा में भी दमोह की पुनरावृत्ति होती दिख रही है। वंशवाद का विरोध करने वाली भाजपा खंडवा में हर्ष चौहान की दावेदारी पर अपने आदर्शों से पीछे हटती दिख रही है, जिसके चलते कार्यकर्ताओं की नाराजगी संगठन और सरकार पर भारी पढ़ सकती है।

2016 में झाबुआ लोकसभा के उपचुनाव मिली थी भाजपा को हार

वंशवाद की घोर विरोधी भाजपा ने 2016 में सासंद दिलीप सिंह भूरिया के निधन पर रिक्त हुई झाबुआ रतलाम लोकसभा सीट पर उनकी बेटी निर्मला भूरिया को चुनाव मैदान में उतारा था, तब प्रदेश सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान सहित 15 मंत्री,16 सांसद और 60 विधायको ने निर्मला भूरिया को जिताने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी, उसके वाबजूद भी कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया से निर्मला भूरिया को करारी हार का सामना करना पड़ा था।

अरुण यादव बनाम कमल - दिग्गी


मप्र कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष, पूर्व केंद्रीय मंत्री और खंडवा लोकसभा से सासंद रह चुके अरुण यादव पर पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ओर दिग्विजय सिंह की जोड़ी भारी पड़ रही हैं। 

अरुण यादव का कमलनाथ ओर दिग्विजयसिंह से तालमेल नही बैठने की खबरे तो पहले से आम है। सूत्रों का कहना है कि दिवगंत सासंद नंद कुमार चौहान के निधन के बाद अरुण यादव को कांग्रेस के आलाकमान से हरी झंडी मिलने के बाद वे खंडवा लोकसभा में सक्रिय हो गए थे लेकिन अब चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद कमलनाथ ओर दिग्विजयसिंह की जोड़ी उन पर भारी पड़ रही है जिसके चलते कल अरुण यादव ने अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटने के।संकेत दिए हैं लेकिन राजनीति के जानकार इसे महज राजनेतिक ड्रामा मान रहे है।

क्या है खंडवा लोकसभा का राजनीतिक इतिहास

1952 में हुए लोकसभा चुनाव में यह संसदीय क्षेत्र अस्तित्‍व में आया। यह क्षेत्र नर्मदा और ताप्‍ती नदी घाटी के बीच बसा है। इस क्षेत्र का प्राचीन नाम खांडव वन था। यहां भगवान राम के वनवास के दौरान ठहरे थे। ओमकारेश्‍वर यहां का लोकप्रिय और पवित्र दर्शनीय स्‍थल है। इसे भारत के 12 ज्योतिर्लिगों में शुमार किया जाता है।  खंडवा लोकसभा में 19 लाख 59 हजार मतदाता है। जिसमें 846,610 महिला मतदाता 912,764 पुरुष मतदाता है। खंडवा लोकसभा सीट के अंतर्गत मान्धाता, बुरहानपुर, बड़वाह, बागली, पंधाना, नेपानगर, बीकनगांव और खंडवा विधानसभा सीट आती हैं. जिनमे बागली, पंधाना, नेपानगर, बीकनगांव सीटें अनुसूचित जनजाति और खंडवा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है।

 जातिगत आंकड़े देखे तो आदिवासी 5 लाख, मुस्लिम 2.5 लाख हरिजन, 3 लाख, 3 लाख  सवर्ण, 1 लाख मराठा शेष अन्य जातियां है, लेकिन यहाँ जातिगत आधार पर चुनाव का माहौल नही रहा हैं, क्षेत्रीय मुद्दे और प्रत्याशी लोकसभा चुनाव के परिणाम पर असरकारक रहे हैं। 1952 से 1957 और 1957 से 1962 तक कांग्रेस के बाबूलाल तिवारी सासंद रहे। 1962 से 1967 तक महेशदत्त मिश्रा कांग्रेस से चुने गए, 1971 और 1977 में गंगाचरण दीक्षित कांग्रेस से सासंद चुने गए। 

वर्ष 1977 परमानंद ठाकुरदास ने कांग्रेस से यह सीट छीनी ओर भारतीय लोकदल (जनता पार्टी) से सासंद बने , वर्ष 1980 में  ठाकुर शिव कुमार सिंह ने चुनाव जीतकर कांग्रेस की वापसी कराई,वर्ष 1984 में कालीचरण  सकारगे कांग्रेस से चुने गए।

वर्ष 1989 में भारतीय जनता पार्टी के इस लोकसभा सीट पर अपना खाता खोला और अमृतलाल तारवाला बीजेपी के सासंद चुने गए, वर्ष 1991 में महेंद्र सिंह कांग्रेस से सासंद निर्वाचित हुए, वर्ष 1996 से 2004 तक नंदकुमार सिंह चौहान बीजेपी से सासंद रहे, वर्ष 
 2009 में अरुण यादव कांग्रेस से चुने गए और 2014 में अरुण यादव को हराकर नंदकुमार चौहान पुनः सासंद बने थे। जाति फेक्टर कभी भी इस लोकसभा में मुद्दा नही रहा हालांकि आजादी के बाद से इस लोकसभा पर नजर डाले तो आदिवासी और हरिजन वोट जो कि कांग्रेस का परम्परा गत वोट माना जाता रहा हैं जिसके चलते कांग्रेस की स्थिति मजबूत रही हैं।

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